इंडस वाटर ट्रीटमेंट पर जिनेवा में हुआ बड़ा आयोजन, कम्युनिटी वाटर राइट्स को लेकर उठी नई आवाज़.

जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 63वें सत्र के दौरान एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई एक्सपर्ट्स और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। इसका मुख्य विषय कम्युनिटी वाटर राइट्स और इंडस वाटर ट्रीटमेंट यानी सिंधु जल संधि का भविष्य था। यह बैठक 17 सितंबर 2026 को होटल रॉयल मनोतेल, जिनेवा में आयोजित की गई थी, जिसमें पानी के बंटवारे और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े कई अहम पहलुओं पर खुलकर बात की गई।
सिंधु जल संधि को एब्युलेंस में रखने का समर्थन
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने साल 2025 में भारत सरकार द्वारा सिंधु जल संधि को एब्युलेंस यानी स्थगित रखने के फैसले का खुलकर समर्थन किया। एक्सपर्ट्स का कहना था कि इस फैसले को भारत की सुरक्षा चिंताओं और सिंधु नदी पर निर्भर स्थानीय समुदायों के अधिकारों के नजरिए से देखा जाना चाहिए। बैठक में transboundary water governance यानी सीमा पार जल प्रबंधन की चुनौतियों और दक्षिण एशिया में जलवायु परिवर्तन के कारण पानी की बढ़ती कमी पर भी चर्चा की गई।
विशेषज्ञों ने रखे अपने विचार
ब्रसेल्स के साउथ एशिया डेमोक्रेटिक फोरम के रिसर्च डायरेक्टर डॉ. सीगफ्रीड ओ. वॉल्फ ने कहा कि भारत के पास 1960 की इस संधि की समीक्षा करने का पूरा संप्रभु अधिकार है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का रवैया इस समझौते की मूल भावना के खिलाफ रहा है। इसके साथ ही उन्होंने पश्चिमी नदियों पर भारत की परियोजनाओं को लेकर फैलाए जा रहे दाบบों को खारिज किया और कहा कि भारत नदियों के पानी को पूरी तरह से रोकता नहीं है, बल्कि यह प्रोजेक्ट्स नॉन-कंजम्पटिव होते हैं और पानी को बाद में आगे छोड़ दिया जाता है। लंदन के मानवाधिकार कार्यकर्ता आरिफ आजकिया ने भी सिंधु जल संधि को निलंबित करने के भारत के कदम को सुरक्षा के लिहाज से बिल्कुल सही ठहराया।
स्थानीय समुदायों और सिंध के अधिकारों पर जोर
जिनेवा के मानवाधिकार विशेषज्ञ मामून रहमान और वर्ल्ड सिंधी कांग्रेस के अध्यक्ष लखू लुवाना ने कहा कि पानी के संसाधनों का बंटवारा केवल दो देशों के बीच का मामला नहीं है, बल्कि इससे सिंध और बलूचिस्तान जैसे प्रांतों के स्थानीय लोगों का जीवन भी जुड़ा हुआ है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे नरेंद्र कुमार, जो कि शिव डेवलपमेंट सोसाइटी के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं, उन्होंने कहा कि इस तरह के मुद्दों पर चर्चा करते समय आम जनता और स्थानीय समुदायों की जरूरतों को केंद्र में रखना बहुत जरूरी है ताकि सभी को पानी का समान अधिकार मिल सके।