बिरzeit में दी गई मशहूर कलाकार Sliman Mansour को अंतिम विदाई, पाँच दशकों तक कला के जरिए बचाई फिलिस्तीनी पहचान.

Aanya27 August 20262 min read44 viewsWorld
बिरzeit में दी गई मशहूर कलाकार Sliman Mansour को अंतिम विदाई, पाँच दशकों तक कला के जरिए बचाई फिलिस्तीनी पहचान.

फिलीस्तीन के जाने-माने चित्रकार, मूर्तिकार और कार्टूनिस्ट Sliman Mansour को श्रद्धांजलि देने के लिए सैकड़ों लोग 25 अगस्त 2026 को बिरzeit में इकट्ठा हुए। उनका निधन 24 अगस्त 2026 को 79 साल की उम्र में हो गया था, जिसके बाद उनके गृह नगर बिरzeit के एक एंग्लिकन चर्च में अंतिम संस्कार किया गया। अल जज़ीरा की रिपोर्टर निदा इब्राहिम ने इस बात की पुष्टि की और बताया कि मंसूर को फिलीस्तीनी कला जगत का एक बहुत बड़ा स्तंभ माना जाता था।

कला के जरिए फिलीस्तीनी संघर्ष को दी पहचान

Sliman Mansour का कला सफर पांच दशकों से भी ज्यादा लंबा रहा है। उन्होंने अपनी कला के माध्यम से हमेशा फिलीस्तीनी पहचान, संस्कृति और 'सुमूद' यानी दृढ़ता को दुनिया के सामने रखा। उनकी साल 1973 में बनाई गई पेंटिंग 'Camel of Hardship' (जमाल अल महामेल) बहुत ज्यादा प्रसिद्ध हुई। इस पेंटिंग में एक बुजुर्ग फिलीस्तीनी व्यक्ति को अपनी पीठ पर यरूशलेम उठाए हुए दिखाया गया है, जो फिलीस्तीनी संघर्ष और उनकी मजबूती का एक बड़ा प्रतीक बन गया। उनकी कलाकृतियों में जैतून के पेड़ और पारंपरिक कढ़ाई वाले कपड़े पहने महिलाएं अक्सर दिखाई देती थीं, जो साल 1967 में कब्जे में ली गई जमीन और क्रांति का संदेश देती थीं।

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संस्थानों की स्थापना में निभाई अहम भूमिका

अपने पूरे जीवन में मंसूर ने फिलीस्तीनी कला को आगे बढ़ाने के लिए कई बड़े काम किए। उन्होंने साल 1973 में लीग ऑफ फिलिस्तीनी आर्टिस्ट्स की शुरुआत की और साल 1986 से 1990 तक इसके प्रमुख रहे। इसके बाद साल 1987 में उन्होंने 'New Visions' नाम से एक कला समूह बनाया। पहले इंतिफादा के दौरान इस समूह ने इजरायली कला सामग्री का बहिष्कार किया था और उसकी जगह मिट्टी, भूसा और मेहंदी जैसी स्थानीय चीजों का इस्तेमाल किया था। इसके अलावा उन्होंने इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ आर्ट फिलीस्तीनी और अल-वास्ती आर्ट सेंटर को स्थापित करने में भी अपना पूरा योगदान दिया।

मिला था बड़ा सम्मान

कला के क्षेत्र में उनके बेहतरीन कामों के लिए उन्हें साल 1998 में विजुअल आर्ट्स के लिए पैलेस्टाइन प्राइज और सातवें काहिरा बिएनले में ग्रैंड नाइल प्राइज से सम्मानित किया गया था। अपनी कला के बारे में बात करते हुए मंसूर ने एक बार कहा था कि उनकी कला में नफरत का कोई संदेश नहीं है, बल्कि यह सिर्फ खूबसूरती और प्यार के लिए है। उनका मानना था कि सांस्कृतिक कार्यों से फिलीस्तीनी लोगों को फिर से इंसान के रूप में पहचान दिलाने में मदद मिलती है। उनके निधन के बाद उनके परिवार ने एक बयान में कहा कि उन्होंने एक ऐसा जीवन जिया जो खूबसूरती और यादों से भरा था और उनकी विरासत उन सभी लोगों के जरिए हमेशा जीवित रहेगी जिन्हें उन्होंने छुआ था।

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