सीरिया बंदी रिहाई: दमिश्क में परिवारों का प्रदर्शन

Gautam Sahu11 October 20262 min read0 viewsWorld
सीरिया बंदी रिहाई: दमिश्क में परिवारों का प्रदर्शन

दमिश्क (सीरिया): इसराइली सेना की हिरासत में बंद अपने रिश्तेदारों की रिहाई की मांग को लेकर सीरिया की राजधानी दमिश्क में 11 अक्टूबर 2026 को परिवारों ने प्रदर्शन किया। हाथों में अपनों की तस्वीरें लिए इन लोगों की सबसे बड़ी मांग थी कि बंदियों को तुरंत छोड़ा जाए और यह साफ़ बताया जाए कि उनके साथ अभी कैसा सलूक हो रहा है।

प्रदर्शन में शामिल परिवारों का दावा है कि इसराइली हिरासत में कम से कम छह नाबालिग भी हैं। उसी दिन तक करीब 49 सीरियाई नागरिक इसराइली सेना की कस्टडी में बताए गए। परिवारों के लिए यह सिर्फ़ आंकड़ा नहीं, बल्कि घर के बच्चों और बुज़ुर्गों की चिंता है, जिनकी खबर उन्हें महीनों से नहीं मिल पा रही।

यह प्रदर्शन ऐसे समय में हुआ है जब दक्षिणी सीरिया में सैन्य गतिविधियाँ तेज़ हुई हैं। सितंबर 2026 में अकेले इसराइल ने दक्षिणी सीरिया में 280 सशस्त्र घुसपैठ कीं, जो इस साल का किसी एक महीने का सबसे ऊँचा आंकड़ा है। 11 अक्टूबर को ही कुनेत्रा और दारा गवर्नरेट में नई घुसपैठ की खबरें भी सामने आईं।

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संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों की चिंता

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इन गिरफ्तारियों को लेकर चिंता बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क ने इसराइली अधिकारियों से सीरियाई गांवों में नागरिकों को परेशान और डराने-धमकाने की गतिविधियाँ रोकने को कहा है। इसमें मनमानी गिरफ्तारियाँ और फ़सलों को नष्ट करना भी शामिल है। संयुक्त राष्ट्र कार्यालय ने यह भी कहा है कि सभी बंदियों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उचित कानूनी प्रक्रिया और मानवीय गरिमा की सुरक्षा मिलनी चाहिए।

सीरियन नेटवर्क फॉर ह्यूमन राइट्स (SNHR) और गोलान में काम कर रहे अल-मरसद अरब ह्यूमन राइट्स सेंटर ने भी गंभीर आरोप दर्ज किए हैं। रिहा किए गए कई बंदियों ने पिटाई, लंबे समय तक ज़बरदस्ती खड़े रखे जाने, परिवार को धमकाए जाने और पूछताछ के दौरान कुत्तों के इस्तेमाल जैसे अनुभव बताए हैं। SNHR ने 2026 की तीसरी तिमाही में 12 गिरफ्तारी मामले दर्ज किए, जिनमें एक बच्चा भी शामिल है।

सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि कई बंदी एक साल से भी ज़्यादा समय से हिरासत में हैं और उन्हें यह नहीं बताया गया कि उन्हें किस वजह से रखा गया है। अक्सर उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता है, और उन ठिकानों का पता भी परिवारों को नहीं चलता। यही अनिश्चितता इन परिवारों के दर्द को और गहर

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