बलूचिस्तान में खूनी खेल: BYC ने टारगेट किलिंग और जबरन गायब लोगों का किया खुलासा

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में मानवाधिकारों का उल्लंघन और हिंसा का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में बलूच यकजेहती कमेटी (BYC) के मानवाधिकार विभाग ने एक बेहद चिंताजनक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें क्षेत्र में बढ़ती टारगेट किलिंग (चुनिंदा हत्याओं) और राज्य प्रायोजित दमन की पोल खोली गई है। BYC ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X के जरिए 2026 के पहले छह महीनों (जनवरी से जून) के दौरान हुई टारगेट किलिंग के दस्तावेजी सबूत साझा किए हैं, जिसने एक बार फिर इस इलाके की भयावह स्थिति को दुनिया के सामने ला दिया है।
बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाला यह संगठन लंबे समय से राज्य द्वारा किए जा रहे अत्याचारों और लोगों को जबरन गायब करने के खिलाफ अभियान चला रहा है। लापता लोगों के परिवारों और विभिन्न राजनीतिक संगठनों का आरोप है कि पाकिस्तानी सरकारी संस्थान बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के नागरिकों का अपहरण कर रहे हैं और उन्हें अज्ञात स्थानों पर कैद कर रखा है। हालांकि, पाकिस्तानी अधिकारी इन आरोपों को सिरे से खारिज करते रहे हैं और व्यवस्थित गायब करने की किसी भी बात से इनकार करते आए हैं।
लापता लोगों का संकट और सरकारी आंकड़ों का सच
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि डर और सुरक्षा चिंताओं के कारण कई मामलों की रिपोर्ट तो दर्ज ही नहीं हो पाती, जिससे इस संकट की असली गहराई छिप जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि 2000 के दशक की शुरुआत में सैन्य अभियानों के तेज होने के बाद से ही गायब होने के मामलों में भारी उछाल आया है। इसमें छात्र, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक शामिल हैं।
अंतरराष्ट्रीय दबाव को कम करने के लिए पाकिस्तान सरकार ने 2011 में 'कमीशन ऑफ इंक्वायरी ऑन एनफोर्स्ड डिसअपियरेन्सेस' का गठन किया था। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2011 से सितंबर 2025 के बीच देशभर में 10,636 शिकायतें मिलीं, जिनमें से 8,986 मामलों का निपटारा हुआ और 1,650 अभी भी जांच के दायरे में हैं। अकेले बलूचिस्तान की बात करें तो जनवरी 2024 की एक रिपोर्ट में 2,752 मामले दर्ज थे, जिनमें से 468 अभी भी लंबित हैं।
हैरानी की बात यह है कि जवाबदेही की कमी साफ नजर आती है। रिपोर्ट के अनुसार, कमीशन ने लापता व्यक्तियों को पेश करने के लिए 744 आदेश जारी किए, लेकिन सरकारी निकायों ने केवल 52 मामलों में ही पालन किया। मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि ये सरकारी आंकड़े जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं और वास्तव में लापता लोगों की संख्या कहीं अधिक है।