मिडटर्म में रिपब्लिकन की ऐतिहासिक हार, पूर्व राजनयिक बोले- ट्रंप के लिए बड़ा झटका
विशेषज्ञों ने डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी की ऐतिहासिक हार का विश्लेषण किया। महंगाई, ईरान युद्ध और घरेलू नीतियों को बताया मुख्य कारण।

नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी को मिडटर्म चुनावों में मिली ऐतिहासिक हार को अनुभवी राजनयिकों ने एक बड़े झटके के रूप में देखा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आर्थिक तंगी, विवादित विदेश नीतियों और घरेलू विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ की गई सख्त कार्रवाई ने मतदाताओं को प्रशासन के खिलाफ खड़ा कर दिया।
पूर्व वरिष्ठ राजनयिक अशोक सज्जनहर ने कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की इस जीत को मौजूदा प्रशासन के लिए एक ऐतिहासिक प्रहार बताया। सज्जनहर के मुताबिक, डेमोक्रेट्स के अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद तो थी, लेकिन यह नतीजा ऐतिहासिक है। उन्होंने कहा कि क्लिंटन के कार्यकाल के दौरान हुए मिडटर्म चुनावों के अलावा ऐसा परिणाम नहीं देखा गया। यह डोनाल्ड ट्रंप के लिए बहुत बड़ा झटका है क्योंकि हर स्तर पर लोग उनके खिलाफ नजर आए।
पूर्व राजनयिक वीणा सिकरी ने जीवनयापन की बढ़ती लागत और वाशिंगटन की विदेशी उलझनों को मतदाता असंतोष का मुख्य कारण बताया। सिकरी ने कहा कि यह राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों के खिलाफ जनता का कड़ा फैसला है। उन्होंने बताया कि इस बार दो मुख्य मुद्दे हावी रहे—महंगाई और अर्थव्यवस्था, और इसके बाद ईरान से जुड़ा युद्ध।
सिकरी के अनुसार, चुनाव से पहले सार्वजनिक समर्थन ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया था और सैन्य कार्रवाई के लिए बहुत कम समर्थन था। उन्होंने बताया कि ईरान युद्ध जैसे मुद्दों पर केवल 22 प्रतिशत जनता ने समर्थन जताया था। ईंधन की कीमतों और महंगाई का सीधा संबंध ईरान युद्ध से है, जिसने ऊर्जा सुरक्षा से समझौता किया और संसाधनों की उपलब्धता कम कर दी।
इसके अलावा, वीणा सिकरी ने वैश्विक व्यापार नीतियों को घरेलू आर्थिक बोझ बढ़ाने वाला बताया। उन्होंने कहा कि आयात शुल्क (टैरिफ) को हथियार के रूप में इस्तेमाल करना एक बड़ा कारक रहा। हालांकि ये टैरिफ विदेशी देशों पर लगाए गए थे, लेकिन इनका असर अमेरिका पर ही पड़ा और अंततः अमेरिकियों को ही इसकी अधिक कीमत चुकानी पड़ी।
पूर्व वरिष्ठ राजनयिक सुरेंद्र कुमार ने जोर देकर कहा कि मतदाताओं ने सीधे वित्तीय दबाव और घरेलू स्तर पर अपनाई गई सख्ती पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने विशेष रूप से विश्वविद्यालयों में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई का जिक्र किया। कुमार ने सवाल किया कि जब डीजल, किराने के सामान, सामान्य महंगाई और होम मॉर्टगेज की लागत बढ़ गई है, तो यह कैसे संभव है कि इन कारकों का वोटों पर असर न पड़ा हो।
कुमार ने बताया कि प्रशासन के रुख ने पुराने समर्थकों को दूर कर दिया और कॉलेज परिसरों में व्यापक तनाव पैदा किया। उन्होंने कहा कि कोलंबिया और हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालयों में छात्र विरोध को दबाने के लिए अपनाए गए कठोर उपायों की वजह से कई लोग अलग हो गए, जिन्होंने पिछले चुनाव में ट्रंप का समर्थन किया था।
सुरेंद्र कुमार ने राजनीतिक नेताओं को चेतावनी देते हुए कहा कि सत्ताधारी वर्ग और आम जनता के लिए यह संदेश है कि उन्हें जमीनी स्तर के लोगों की भावनाओं से जुड़े रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि आप जनमत की अनदेखी कर अपनी नीतियों और फैसलों को जबरन थोपते हैं, तो आप ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाएंगे।
यह विश्लेषण ऐसे समय में आया है जब 2026 के मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेट्स की वापसी हो रही है। अमेरिकी नेटवर्क के अनुमान है कि यह पार्टी कांग्रेस के दोनों सदनों पर फिर से नियंत्रण हासिल कर लेगी, जिससे वाशिंगटन में सत्ता का संतुलन काफी बदल जाएगा। हाउस में बहुमत मिलने से डेमोक्रेट्स जांच और सुनवाई के जरिए ट्रंप प्रशासन की निगरानी बढ़ा सकेंगे, जबकि सीनेट पर नियंत्रण से कानून बनाने और राष्ट्रपति द्वारा किए जाने वाले नामांकनों पर उनका प्रभाव बढ़ेगा।