RAF फेयरफोर्ड घटना: ट्रंप ईरान पर और कार्रवाई पर विचार में

वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार, 12 अक्टूबर 2026 को कहा कि वॉशिंगटन ईरान के खिलाफ और कदम उठाने पर विचार कर रहा है। यह बयान उस आरोप के बाद आया है, जिसमें ब्रिटेन और 28 सहयोगी देशों के एक समूह ने ईरान को ग्लूसेस्टरशायर स्थित RAF फेयरफोर्ड एयरबेस की एक सुरक्षा घटना से जोड़ा है।
घटना 27 सितंबर 2026 की है। पुलिस ने पांच ब्रिटिश नागरिकों को गिरफ्तार किया था, जब उनकी वैन में पेट्रोल मिला। हालांकि कोई विस्फोटक बरामद नहीं हुआ। बाद में सभी संदिग्धों को पुलिस जमानत पर छोड़ दिया गया और उन पर कोई आरोप तय नहीं हुआ। इसके बावजूद मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेजी से गरमा गया।
ट्रंप ने 2 अक्टूबर 2026 को कहा था कि ईरान से जुड़े खतरे की वजह से अमेरिका को 4 अक्टूबर को इस एयरबेस से अपने बमवर्षक वापस बुलाने पड़े। अब उन्होंने इस मामले में आगे की संभावित कार्रवाई की ओर इशारा किया है।
ब्रिटेन ने संसद में क्या कहा
ब्रिटिश प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने 12 अक्टूबर को संसद में कहा कि यह साजिश ईरान में रची गई होने की "अत्यधिक संभावना" है। उन्होंने यह भी कहा कि इसे लगभग निश्चित रूप से ईस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के निर्देश पर अंजाम दिया गया। गृह सचिव शबाना महमूद ने सांसदों को बताया कि विदेश सचिव एड मिलिबैंड ने हालात पर चर्चा के लिए ईरानी राजदूत को तलब किया है। इसी दौरान ब्रिटेन ने ईरान के लिए जासूसी करने के आरोपी दो व्यक्तियों पर प्रतिबंध भी लगा दिए।
इसके अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और स्पेन समेत 30 देशों के एक संयुक्त बयान में ईरान की कथित शत्रुतापूर्ण गतिविधियों की निंदा की गई। इस बयान में फेयरफोर्ड घटना को हरकत अशाब अल-यमीन अल-इस्लामिया (HAYI) नाम के एक समूह के व्यापक अभियान से जोड़ा गया है।
ईरान ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। तेहरान के विदेश मंत्रालय और ब्रिटेन में ईरानी राजदूत अली मूसवी ने 12 अक्टूबर को इन्हें "निराधार और दुर्भावनापूर्ण अटकलें" बताया। ईरान ने ठोस सबूत मांगे हैं और जांच में सहयोग की पेशकश भी की है। उसने उल्टा ब्रिटेन पर आरोप लगाया कि वह ईरान के खिलाफ सैन्य आक्रामकता में अपनी भूमिका से ध्यान हटाने की कोशिश कर रहा है।
फिलहाल यह साफ नहीं है कि अमेरिका की आगे की कार्रवाई किस रूप में होगी। लेकिन ब्रिटेन, अमेरिका और उनके सहयोगियों के सख्त रुख और ईरान के खंडन से यह मामला आने वाले दिनों में कूटनीतिक तनाव का बड़ा केंद्र बन सकता है।