तुर्की संसद में मक्का रक्षा समझौते पर बहस शुरू, 27 अक्टूबर को समिति ने दी थी मंजूरी
सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के अनुसमर्थन पर तुर्की संसद में बहस शुरू हो गई है।

अंकारा: तुर्की की ग्रैंड नेशनल असेंबली ने 4 नवंबर, 2026 को मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के अनुसमर्थन पर आधिकारिक तौर पर चर्चा शुरू कर दी है। इस विधायी बहस से पहले 27 अक्टूबर, 2026 को तुर्की संसद की विदेश मामलों की समिति ने इस समझौते को अपनी मंजूरी दे दी थी।
यह समझौता सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच एक त्रिपक्षीय रक्षा ढांचे की स्थापना करता है। इस संधि पर 7 अगस्त, 2026 को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप ताय्यप एर्दोगन और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर किए थे।
कुल 16 अनुच्छेदों वाले इस समझौते के अनुच्छेद 2 में सामूहिक रक्षा रणनीति का उल्लेख है। इसके मुताबिक, किसी भी एक हस्ताक्षरकर्ता देश पर सशस्त्र हमला या सैन्य आक्रमण सभी देशों पर हमला माना जाएगा।
यह सहायता संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत आत्मरक्षा के अधिकार पर आधारित है। इसके लिए औपचारिक अनुरोध, त्रिपक्षीय सहमति और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन की आवश्यकता होगी।
यह संधि कम से कम 10 वर्षों की अवधि के लिए खुफिया जानकारी साझा करने, संयुक्त हथियारों के उत्पादन, अनुसंधान एवं विकास और रसद सहयोग को बढ़ावा देती है। हालांकि, तुर्की अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि इस अनुसमर्थन का मतलब सैनिकों की तैनाती का अधिकार देना नहीं है।
तुर्की के संविधान के अनुच्छेद 92 के तहत, विदेश में तुर्की बलों की तैनाती या तुर्की के भीतर विदेशी सैनिकों की तैनाती के लिए अलग से संसदीय जनादेश (तेज़केरे) की आवश्यकता होगी। अधिकारियों ने बताया कि यह समझौता पूरी तरह से रक्षात्मक है और इसे नाटो के विकल्प के बजाय उसके पूरक के रूप में डिजाइन किया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह किसी विशेष देश को लक्षित नहीं करता है।
दूसरी ओर, तुर्की संसद में विपक्षी सदस्यों ने इस संधि को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने संभावित सुरक्षा जोखिमों और यमन जैसे क्षेत्रों में भविष्य की सैन्य तैनाती के निहितार्थों पर सवाल उठाए हैं।