बलूचिस्तान में गोलीबारी की दो अलग-अलग घटनाओं में दो लोगों की मौत

पाकिस्तान के अशांत प्रांत बलूचिस्तान में हिंसा का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में प्रांत के दो अलग-अलग जिलों—नुश्की और केच—में हुई गोलीबारी की घटनाओं में दो लोगों की जान चली गई है, जबकि एक अन्य व्यक्ति घायल हुआ है। इन हत्याओं के बाद स्थानीय स्तर पर तनाव और सुगबुगाहट तेज हो गई है, क्योंकि मारे गए दोनों व्यक्तियों के कथित तौर पर सशस्त्र समूहों से जुड़े होने की चर्चा है।
नुश्की और केच जिलों में खूनी संघर्ष
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स और सूत्रों के अनुसार, पहली घटना नुश्की जिले में कादिरबाद बाईपास के पास घटी। यहाँ अज्ञात हमलावरों ने अचानक अंधाधुंध गोलियां चला दीं। इस हमले में शाह खालिद नामक व्यक्ति की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि अब्दुल रउफ बारेच नाम का एक अन्य शख्स गंभीर रूप से घायल हो गया। स्थानीय लोगों का दावा है कि शाह खालिद एक ऐसे सशस्त्र समूह से जुड़ा हुआ था जिसे कथित तौर पर सैन्य समर्थन प्राप्त है। हालांकि, इस हमले के पीछे का असली मकसद और हमलावरों की पहचान अभी तक साफ नहीं हो पाई है। किसी भी संगठन ने इस घटना की जिम्मेदारी नहीं ली है और प्रशासन की ओर से भी इस पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
दूसरी घटना केच जिले के बुलेदा क्षेत्र के जिरदान इलाके में हुई। यहाँ अज्ञात बंदूकधारियों ने हमीद नामक एक अन्य व्यक्ति को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। स्थानीय सूत्रों ने इसे भी क्षेत्रीय मिलिशिया से जोड़ते हुए कई गंभीर दावे किए हैं, हालांकि इन दावों की किसी स्वतंत्र एजेंसी ने पुष्टि नहीं की है।
'डेथ स्क्वॉड' और मानवाधिकारों के सवाल
इन ताजा हत्याओं ने बलूचिस्तान में सक्रिय उन सशस्त्र समूहों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है जिन्हें स्थानीय निवासी और मानवाधिकार कार्यकर्ता अक्सर 'डेथ स्क्वॉड' के रूप में संबोधित करते हैं। मानवाधिकार संगठनों और पीड़ितों के परिवारों का लंबे समय से यह आरोप रहा है कि ये मिलिशिया सुरक्षा एजेंसियों की शह पर काम करती हैं और क्षेत्र में जबरन लापता करने, डराने-धमकाने तथा लक्षित हत्याओं जैसी वारदातों में शामिल रही हैं। केच, पंजगुर, खुजदार और मस्तुंग जैसे इलाकों में इस तरह के आरोप पहले भी कई बार सामने आ चुके हैं।
दूसरी ओर, पाकिस्तानी अधिकारियों ने हमेशा इन आरोपों का खंडन किया है। सरकार और सैन्य प्रशासन का यही पक्ष रहा है कि राज्य संस्थान ऐसे किसी भी सशस्त्र समूह को प्रायोजित या नियंत्रित नहीं करते हैं। बावजूद इसके, जमीनी हकीकत यह है कि इस तरह की हिंसक घटनाएं बलूचिस्तान की कानून-व्यवस्था और सुरक्षा पर लगातार बड़े सवाल खड़े कर रही हैं।