अमेरिका में इंटरनेशनल स्टूडेंट्स को बड़ी राहत, जज ने ट्रंप प्रशासन के फैसले को बताया गैर-कानूनी.

अमेरिका की एक अदालत ने अंतरराष्ट्रीय छात्रों के हक में एक बहुत बड़ा फैसला सुनाया है। उत्तरी कैलिफोर्निया की यूएस डिस्ट्रिक्ट जज Noël Wise ने शुक्रवार, 29 अगस्त 2026 को यह साफ कर दिया कि ट्रंप प्रशासन ने गाजा में इजरायल की कार्रवाई की आलोचना करने वाले विदेशी छात्रों के अधिकारों का उल्लंघन किया था। अदालत ने अपने फैसले में यह माना कि सरकार ने इन लोगों की आवाज दबाने और उन्हें देश से बाहर निकालने की कोशिश की थी, जो कि अमेरिका के संविधान के पहले और पांचवें संशोधन के बिल्कुल खिलाफ है। इस फैसले के बाद उन तमाम छात्रों को बड़ी राहत मिली है जो पिछले कुछ समय से लगातार डर के साये में जी रहे थे और अपनी बात खुलकर नहीं कह पा रहे थे।
अदालत ने खारिज किए कड़े नियम
जज नोएल वाइज ने आव्रजन कानून के उन खास नियमों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है जिनका इस्तेमाल इन छात्रों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा था। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार किसी भी नागरिक या गैर-नागरिक से बोलने की आजादी नहीं छीन सकती है। अदालत का मानना है कि जब लोग सरकारी कार्रवाई के डर से खुद ही अपनी जुबान बंद कर लेते हैं, तो वैसी आजादी का कोई मतलब नहीं रह जाता है और इससे देश का लोकतंत्र भी कमजोर होता है। यह पूरा कानूनी विवाद मार्च 2025 में शुरू हुआ था, जब कई छात्रों को हिरासत में लिया जाने लगा था। इसके बाद FIRE (Foundation for Individual Rights and Expression) नाम की संस्था ने छात्रों की तरफ से यह कानूनी लड़ाई लड़ी थी। इस संस्था के मुख्य वकील Conor Fitzpatrick ने अदालत के इस फैसले की जमकर तारीफ की और कहा कि बोलने की आजादी हर इंसान का मौलिक अधिकार है, फिर चाहे वह वहां का नागरिक हो या ना हो।
वीजा रद्द करने की दी गई थी धमकी
ट्रंप प्रशासन के आने के बाद से ही ऐसे कई कदम उठाए गए थे जिनकी वजह से चारों तरफ आलोचना हो रही थी। खास तौर पर मार्च 2025 में विदेश मंत्री Marco Rubio ने एक बयान दिया था जिसमें उन्होंने कहा था कि वह फिलिस्तीन के समर्थन में खड़े होने वाले विदेशी छात्रों के वीजा रद्द कर देंगे। उन्होंने यह तक कह दिया था कि जब भी उन्हें ऐसा कोई व्यक्ति मिलेगा, वह उसका वीजा छीन लेंगे। इस तरह के बयानों की वजह से पूरे देश के विश्वविद्यालयों में, खासकर Stanford University जैसे बड़े संस्थानों में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों के मन में एक अजीब सा डर बैठ गया था। वे खुलकर कुछ भी बोलने से डरते थे क्योंकि उन्हें हमेशा देश से निकाले जाने का खतरा सताता रहता था। इस डर की शुरुआत कोलंबिया यूनिवर्सिटी से पासआउट हुए छात्र Mahmoud Khalil को मार्च 2025 में हिरासत में लिए जाने के बाद हुई थी, जिसके बाद से लगातार विरोध और कानूनी मुकदमेबाजी चल रही थी।
पहले भी आ चुका है ऐसा ही फैसला
यह फैसला कोई पहला नहीं है, बल्कि इससे पहले भी अमेरिकी अदालतों ने प्रशासन के ऐसे ही आदेशों के खिलाफ आवाज उठाई थी। इससे पहले 30 सितंबर 2025 को बोस्टन में यूएस डिस्ट्रिक्ट जज William Young ने भी ऐसा ही एक फैसला सुनाया था। वह मामला AAUP (American Association of University Professors) और MESA (Middle East Studies Association) से जुड़ा हुआ था। जांच में यह बात सामने आई थी कि विदेश विभाग और गृह विभाग मिलकर विश्वविद्यालयों में हो रही बहसों और चर्चाओं को पूरी तरह से दबाना चाहते थे। वे छात्रों को देश से बाहर भेजने की धमकियां देकर परिसरों में डर का माहौल बना रहे थे, जिसे अब अदालत ने गैर-कानूनी करार दे दिया है।