अमेरिका में नया कानून पास, रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर लग सकता है 100 प्रतिशत टैरिफ

संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रतिनिधि सभा यानी US House of Representatives ने 16 September 2026 को एक बेहद कड़ा कानून पास किया है। इस नए कानून का नाम Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 रखा गया है, जिसके तहत रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल आयात करने वाले देशों पर 100 percent तक का भारी भरकम टैक्स यानी टैरिफ लगाने का रास्ता साफ हो गया है। इस बड़े फैसले के बाद से दुनिया भर के बाजारों में हलचल मच गई है, क्योंकि इससे भारत जैसे देशों की ऊर्जा जरूरतों और आयात नीतियों पर सीधा असर पड़ सकता है। अमेरिकी संसद के निचले सदन में इस प्रस्ताव के पक्ष में 262 votes पड़े और विरोध में 159 votes आए, जबकि सीनेट में इसे पहले ही अगस्त महीने में 86 to 11 मतों से मंजूरी मिल चुकी थी। अब यह बिल देश के राष्ट्रपति Donald Trump के पास उनके अंतिम हस्ताक्षर के लिए भेजा गया है, जिसके बाद इसे कानून के रूप में लागू किया जाएगा।
भारत सरकार की नजर और ऊर्जा सुरक्षा पर जोर
इस पूरे घटनाक्रम पर भारत के विदेश मंत्रालय यानी Ministry of External Affairs ने 17 September 2026 को अपना आधिकारिक बयान जारी किया है। मंत्रालय के प्रवक्ता ने साफ किया कि अधिकारी इस पूरी स्थिति पर बेहद बारीकी से नजर बनाए हुए हैं और देश के 1.4 billion लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। सरकार का यह भी कहना है कि देश के व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाया जाएगा। अमेरिकी अधिकारियों के साथ इस बिल के दोनों देशों के आपसी रिश्तों और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर पड़ने वाले असर को लेकर उच्च स्तर की बातचीत पहले ही हो चुकी है।
नए प्रतिबंधों के नियम और भारत पर संभावित असर
इस नए कानून के दायरे में रूसी अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों और देश के रक्षा तथा ऊर्जा क्षेत्रों से जुड़ी कंपनियों पर पहले से लगे प्रतिबंधों को और अधिक विस्तार दिया गया है। इसके अलावा पश्चिमी देशों की सेवाओं से बचकर रूसी तेल ले जाने वाले शैडो टैंकर बेड़े को भी विशेष तौर पर निशाना बनाया गया है। इस पूरे पैकेज के तहत ईरान से जुड़े प्रतिबंधों को भी आगे बढ़ाया गया है। नई दिल्ली के लिए इस कानून में सबसे चिंताजनक बात यह है कि इसमें राष्ट्रपति को विवेकाधीन यानी अपनी मर्जी से सेकेंडरी टैरिफ लगाने की ताकत दी गई है। हालांकि इस बिल में भारतीय रिफाइनरियों द्वारा रूसी तेल खरीदने पर सीधा प्रतिबंध नहीं लगाया गया है, लेकिन इसने व्हाइट हाउस को एक ऐसा हथियार दे दिया है जिसका इस्तेमाल वह अपनी जरूरत के हिसाब से छूट देने, देरी करने या चुनिंदा तरीके से कर सकता है।
आंकड़े और व्यापार पर पड़ने वाला वित्तीय दबाव
हाउस की बहसों के दौरान अक्सर भारत और चीन को रूसी ऊर्जा के सबसे बड़े खरीदारों के रूप में याद किया गया है। हालांकि इस बिल में 100 percent टैरिफ की अधिकतम सीमा तय की गई है, लेकिन यह आंकड़ा अपने आप में कोई स्वचालित जुर्माना नहीं है बल्कि एक संभावित ऊपरी सीमा है। इस हफ्ते सामने आए व्यापार शोध आंकड़ों के मुताबिक भारत ने वित्त वर्ष 2026 में लगभग 40.8 billion dollars का रूसी कच्चा तेल आयात किया था, जो देश के कुल क्रूड आयात बिल का करीब 30 percent हिस्सा बनता है। साल 2026 के बीच के महीनों के आंकड़े बताते हैं कि समुद्री मार्ग से आने वाले कुल कच्चे तेल में रूसी बैरल की हिस्सेदारी कई मौकों पर करीब 45 percent तक पहुंच गई थी।
घरेलू बाजार और रिफाइनरियों की चुनौतियां
यदि अमेरिका की तरफ से भारतीय सामानों पर 100 percent का शुल्क लगा दिया जाता है, तो इससे अमेरिका पहुंचने वाले भारतीय सामानों की लागत बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी। वैश्विक व्यापार अनुसंधान पहल के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय निर्यातकों ने वित्त वर्ष 2026 में संयुक्त राज्य अमेरिका को लगभग 86.5 billion dollars के सामान भेजे थे। अगर व्हाइट हाउस इस नए हथियार का इस्तेमाल करके रूस से तेल की खरीद कम करने का दबाव बनाता है, तो उसका सीधा असर देश के भीतर ईंधन की महंगाई और रिफाइनरियों के मुनाफे पर पड़ सकता है। इस हफ्ते बयान देने वाले रिफाइनरी अधिकारियों का साफ कहना है कि रूसी क्रूड की जगह किसी दूसरे विकल्प को उतनी ही किफायती कीमत पर तुरंत ढूंढ पाना बहुत बड़ी चुनौती साबित होगा।
आगे क्या होगा और बाजार की निगाहें
यह कानून मूल रूप से अप्रैल 2025 में एक विचार के रूप में शुरू हुआ था और जुलाई 2026 में दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम के निधन के बाद इसका नाम बदला गया था। विभिन्न वित्तीय अखबारों में छपे अर्थशास्त्रियों के लेखों के अनुसार, इस कानून का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि राष्ट्रपति इस पर क्या अंतिम घोषणा करते हैं। फिलहाल उत्पाद का दायरा, विशिष्ट टैरिफ दरें और इसे लागू करने की तारीख जैसी जरूरी जानकारियां सामने नहीं आई हैं। तब तक भारतीय सामानों पर 100 percent टैरिफ का खतरा केवल एक कार्यकारी अधिकार की हेडलाइन बनकर रह गया है, न कि कोई सक्रिय कस्टम्स नोटिफिकेशन। बाजार के जानकारों और सरकारी अधिकारियों की निगाहें अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर और आगामी अक्टूबर महीने के कार्गो बुकिंग डेटा पर टिकी हैं।