अमेरिका का ईरान पर बड़ा हमला: परमाणु समझौते के मौके गंवाए, अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त

अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब एक बेहद नाजुक मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिकी प्रशासन ने साफ कर दिया है कि वह ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अब और नरमी नहीं दिखाएगा। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कड़े शब्दों में कहा कि ईरान के पास अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर समझौता करने के कई मौके थे, लेकिन उसने उन सभी अवसरों को बर्बाद कर दिया। रुबियो ने यह बात 7 अक्टूबर 2026 को एथेंस में बोलते हुए कही, जहां उन्होंने दावा किया कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की वजह से ईरान की अर्थव्यवस्था अब 'पूरी तरह से फ्रीफॉल' (तेजी से गिरना) की स्थिति में है।
अमेरिका का रुख केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक भी सख्त है। विदेश मंत्री रुबियो ने यह भी दावा किया कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर अपना नियंत्रण पूरी तरह खो दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका की नीति अटल है और वह किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा।
परमाणु क्षमता में कटौती की मांग और नेतृत्व का संकट
इस बीच, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने रॉयटर्स को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि अगर hostilities (शत्रुता) को खत्म करना है, तो ईरान को अपनी परमाणु संवर्धन क्षमता में 'सार्थक' और 'महत्वपूर्ण' कटौती करनी होगी। वेंस ने दो टूक शब्दों में कहा कि अमेरिका अब सिर्फ बातों से काम नहीं चलाएगा, बल्कि उसे जमीन पर सत्यापन योग्य परिणाम चाहिए।
अमेरिका ने ईरान के आंतरिक हालात पर भी सवाल उठाए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति वेंस दोनों ने इस बात पर हैरानी जताई कि सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद अब ईरान की कमान किसके हाथ में है। राष्ट्रपति ट्रंप ने तेहरान के ताजा प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है और चेतावनी दी है कि सैन्य अभियान और तेज हो सकते हैं।
दूसरी तरफ, ईरान के सेंट्रल बैंक के गवर्नर अब्दोलनासेर हेम्मती ने अमेरिकी दावों को 'भ्रम' करार दिया है। उनका कहना है कि ईरान के पास बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है और अर्थव्यवस्था ढहने की खबरें गलत हैं।
कूटनीतिक मोर्चे पर भी हालात बिगड़ते दिख रहे हैं। 1 अक्टूबर 2026 को विदेश मंत्री रुबियो ने ईरानी प्रतिनिधिमंडल और विदेश मंत्री अब्बास अराघची को अमेरिका छोड़ने का आदेश दिया, जिससे बातचीत पूरी तरह ठप हो गई। हालांकि, कतर इस समय मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है ताकि वाशिंगटन और तेहरान के बीच संवाद फिर से शुरू हो सके, लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य का मुद्दा अभी भी एक बड़ी अड़चन बना हुआ है।