अमेरिका का बड़ा ऐलान, ईरानी कमांडर का सुराग देने पर मिलेगा 1 करोड़ डॉलर का इनाम.

अमेरिकी सरकार ने ईरान के साइबर वारफेयर कमांडर की जानकारी देने वाले को भारी भरकम इनाम देने की घोषणा की है। अमेरिकी विदेश विभाग के Rewards for Justice प्रोग्राम के तहत ब्रिगेडियर जनरल Amir Yaryab के बारे में सही जानकारी या उनका ठिकाना बताने वाले को लगभग $10 मिलियन यानी 1 करोड़ डॉलर तक का इनाम दिया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार यह कदम देश की सुरक्षा को मजबूत करने और अवैध साइबर गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए उठाया गया है।
कौन हैं ब्रिगेडियर जनरल Amir Yaryab और क्या है आरोप
अमेरिकी अधिकारियों की रिपोर्ट के मुताबिक Amir Yaryab ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC के साइबर-इलेक्ट्रॉनिक कमांड में एक बड़े अधिकारी हैं। वह संगठन के भीतर कई आक्रामक यूनिट्स और फर्जी कंपनियों के नेटवर्क को संभालने का जिम्मा संभालते हैं। उन पर विशेष रूप से Shahid Hemmat और Shahid Shoushtari जैसी एलीट साइबर यूनिट्स को मैनेज करने का गंभीर आरोप लगा है। इसके अलावा वह CyberAv3ngers नाम के एक छद्म समूह की भी निगरानी करते रहे हैं जिस पर साल 2023 और 2024 के दौरान पानी से जुड़े यूटिलिटी इंफ्रास्ट्रक्चर पर साइबर हमले करने का शक जताया गया था।
किन क्षेत्रों को बनाया जा रहा है निशाना
जांच अधिकारियों का ऐसा कहना है कि Amir Yaryab के निर्देश पर कई ऐसी हैकिंग गतिविधियों को अंजाम दिया जाता है जिनसे अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व के देशों का महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा खतरे में पड़ जाता है। इन恶意 गतिविधियों की चपेट में देश की रक्षा प्रणाली, ऊर्जा क्षेत्र, समाचार संस्थान, शिपिंग, यात्रा सेवाएं, वित्तीय तंत्र और टेलीकम्युनिकेशन सिस्टम जैसे बेहद अहम सेक्टर आते हैं। पश्चिमी देशों की खुफिया एजेंसियां इन सभी हरकतों को पारंपरिक जासूसी से कहीं आगे बढ़कर सीधे तौर पर तोड़फोड़ यानी एक्टिव सबोटेज मानती हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा और सुरक्षा कानून
इस इनाम की घोषणा की खबर सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर Akhbar24 के माध्यम से 5 सितंबर 2026 को सामने आई थी। इस पूरे घटनाक्रम से अमेरिका की उन कोशिशों को और अधिक बल मिलता है जो वह कंप्यूटर धोखाधड़ी और दुरुपयोग अधिनियम यानी CFAA का उल्लंघन करने वाली अनधिकृत साइबर गतिविधियों के खिलाफ लगातार कर रहा है। दुनिया भर में इस तरह के साइबर हमलों से निपटने के लिए अब तमाम बड़े देश अपनी सुरक्षा व्यवस्था को पहले से अधिक चौकस कर रहे हैं ताकि संवेदनशील डेटा और बुनियादी सुविधाओं को सुरक्षित रखा जा सके।