यमन में हाउती विद्रोहियों का बड़ा हमला, सऊदी अरब की मदद करने से अमेरिका का इनकार

मध्य पूर्व में हालात लगातार तनावपूर्ण होते जा रहे हैं और हाल ही में यमन के मोर्चे पर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी नीति विश्लेषक Kenneth Katzman ने एक इंटरव्यू में बताया कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने सऊदी अरब की सैन्य सहायता की मांग को स्वीकार कर लिया होता, तो Houthi विद्रोहियों के इस खतरनाक सैन्य आगे बढ़ने को समय रहते रोका जा सकता था। सऊदी क्राउन प्रिंस Mohammed bin Salman ने पिछले हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति को दो बार फोन करके सैन्य हस्तक्षेप की औपचारिक अपील की थी, लेकिन वाशिंगटन ने इस संघर्ष को अपनी समस्या मानने से साफ मना कर दिया।
सऊदी अरब के तेल शिपमेंट और मुख्य ठिकानों पर असर
अमेरिकी मदद न मिलने के बाद हाउती विद्रोहियों ने यमन के लाल सागर के बचे हुए तट पर अपना नियंत्रण मजबूत कर लिया है। इसमें रणनीतिक बंदरगाह शहर Mokha और बाब अल-मंडब जलडमरूमध्य में स्थित Perim Island (Mayyun) भी शामिल हैं, जो वैश्विक शिपिंग के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। इन क्षेत्रीय नुकसानों के जवाब में सऊदी अरब ने एक प्रमुख पाइपलाइन के जरिए तेल शिपमेंट को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया है। संघर्ष का दायरा तब और बढ़ गया जब विद्रोहियों ने शरौरा सैन्य बेस पर ड्रोन और मिसाइल दागे, जिससे हथियार डिपो और कमांड सेंटर को निशाना बनाया गया। इसके अलावा, जाजान स्थित एक बेस पर बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइल हमलों में दो लोग घायल हो गए और एक मस्जिद को भी भारी नुकसान पहुंचा।
नागरिक सुरक्षा और क्षेत्रीय कूटनीति
हालात की गंभीरता को देखते हुए 13 सितंबर 2026 को सऊदी अधिकारियों ने अभहा और खमीस मुशैत शहरों में नागरिकों को संभावित हमलों से सतर्क करने के लिए आपातकालीन सायरन बजाए। इन तमाम झटकों के बाद क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पड़ोसी मध्य पूर्वी देशों और इस्राइल से क्षेत्रीय सहायता की गुहार लगाई है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच मानवीय संकट काफी गहरा गया है और सितंबर की शुरुआत से लेकर अब तक यमन में 80,000 से अधिक लोग बेघर हो चुके हैं। इसके अलावा, हाउती विद्रोहियों ने सऊदी लाल सागर के बंदरगाहों की आधिकारिक नाकेबंदी की घोषणा कर दी है, जिससे विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक तेल आपूर्ति पर ईरान का प्रभाव और अधिक बढ़ सकता है।