अमेरिका ने खारिज किया ईरान का सात दिवसीय प्लान, स्ट्रेट ऑफ होरमुज को लेकर तनातनी जारी.

फारस की खाड़ी और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में तनाव उस समय और बढ़ गया जब अमेरिका ने ईरान के उस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें स्ट्रेट ऑफ होरमुज को सात दिन के भीतर फिर से खोलने की बात कही गई थी। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा की एक निजी बैठक के दौरान यह सात दिवसीय योजना पेश की थी। इस प्रस्ताव के तहत ईरान का कहना था कि अगर अमेरिका उसके बंदरगाहों से नौसैनिक नाकाबंदी हटा ले, तेल प्रतिबंधों को माफ कर दे और लेबनान में संघर्ष विराम लागू कर दिया जाए, तो इस रास्ते को दोबारा खोल दिया जाएगा। हालांकि, अमेरिकी प्रशासन ने इस पूरे प्रस्ताव को लेकर अपनी गहरी नाराजगी और अविश्वास जताया है।
प्रस्ताव की शर्तें और अमेरिका का रुख
ईरान के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया था कि अमेरिकी कदम चार से पांच दिनों में पूरे होने चाहिए, जिसके बाद छठे दिन जलडमरूमध्य को खोल दिया जाएगा और सातवें दिन से बातचीत शुरू होगी। लेकिन अटलांटिक काउंसिल के वरिष्ठ फेलो Thomas Warrick ने इस योजना को कूटनीतिक चाल बताया और कहा कि इसमें कोई असली नीयत नहीं है, क्योंकि अमेरिका लगातार अंतरराष्ट्रीय शिपिंग के लिए स्ट्रेट ऑफ होरमुज को पूरी तरह खोलने की मांग कर रहा है जिस पर तेहरान ने अब तक कोई ठोस भरोसा नहीं दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है और अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक नक्शा भी शेयर किया जिसमें स्ट्रेट ऑफ होरमुज को 'Trump Strait' नाम दिया गया है। अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने कहा कि यदि कोई मौका बनता है तो प्रशासन विचारों का आदान-प्रदान करेगा, लेकिन एक अन्य अमेरिकी अधिकारी ने साफ किया कि अभी किसी भी समझौते को जल्दबाजी में अंतिम रूप देने की कोई जल्दी नहीं है क्योंकि अमेरिका की सामरिक स्थिति मजबूत बनी हुई है।
जमीनी हालात और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
क्षेत्रीय हालात लगातार नाजुक बने हुए हैं और 14 जुलाई को अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी फिर से लागू होने के बाद से अब तक 122 कमर्शियल जहाजों को डायवर्ट किया जा चुका है, जिनमें पिछले 48 घंटों के दौरान 7 जहाज शामिल हैं। इसके विपरीत, पिछले दो दिनों में अमेरिकी सैन्य सुरक्षा के बीच लगभग 4 करोड़ बैरल कच्चा तेल इस रास्ते से गुजरा है, भले ही कुछ अमेरिकी युद्धपोतों ने अपनी तैनाती पूरी कर ली हो या अपनी स्थिति बदल ली हो। इस पूरे मामले पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश बंटे नजर आ रहे हैं जहां चीन ने ईरानी प्रस्ताव का समर्थन किया है, जबकि सऊदी अरब ने इस पर शक जाहिर किया है। क्विंसी इंस्टीट्यूट के कार्यकारी उपाध्यक्ष Trita Parsi का मानना है कि इस प्रस्ताव को नवंबर के मध्यावधि चुनावों से पहले राष्ट्रपति ट्रंप को लुभाने के लिए तैयार किया गया था। वहीं दूसरी तरफ, ब्रीफिंग डॉट कॉम के पैट्रिक ओ'हरे ने इस प्रस्ताव को संदिग्ध बताया है। ईरानी राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने यह भरोसा दिलाया है कि यदि अमेरिका इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है तो उनका देश सभी वादों का पक्का रहेगा और दीर्घकालिक संघर्ष विराम के हिस्से के रूप में संयुक्त राष्ट्र के परमाणु निरीक्षकों को भी एक्सेस दी जाएगी।