Strait of Hormuz Tension: अमेरिका ने ईरान पर किया हमला, जॉर्डन ने रोकी मिसाइलें, भारतीय यात्रियों के लिए उड़ानों पर असर.

खाड़ी देशों में सुरक्षा हालात अचानक से काफी तनावपूर्ण हो गए हैं क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच सीधी गोलीबारी और हमलों का दौर शुरू हो गया है। 31 अगस्त 2026 की सुबह को फारसी खाड़ी और आसपास के इलाकों में हड़कंप मच गया, जब यह खबर सामने आई कि अमेरिकी सेना ने ईरान के नियंत्रण वाले Larak Island पर जोरदार हमला बोल दिया है। इस पूरी घटना ने खाड़ी देशों में रहने वाले प्रवासियों और भारत आने-जाने वाले यात्रियों की चिंता को काफी बढ़ा दिया है, क्योंकि इस पूरे विवाद का असर अब हवाई यात्राओं और विमानों के रूट पर भी पड़ने लगा है।
अमेरिकी हमला और ईरान का पलटवार
बीते रविवार की देर रात को अमेरिकी फौजों ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के पास स्थित लरक द्वीप पर अचानक कार्रवाई की। अमेरिकी सेंट्रल कमांड यानी CENTCOM के मुताबिक, यह कार्रवाई बहुत ही सीमित और बेहद सटीक तरीके से की गई थी। इस हमले का मुख्य मकसद ईरान के उन रॉकेट लॉन्चर्स और बारूदी सुरंग बिछाने वाले उपकरणों को नष्ट करना था, जिन्हें अमेरिकी बलों ने कमर्शियल जहाजों और समुद्री व्यापार के लिए एक बड़ा खतरा मान लिया था। लरक द्वीप ईरान के हॉर्मोजगन प्रांत में बांदर अब्बास के पास मौजूद है, और यह इलाका वैश्विक स्तर पर तेल और एलएनजी के निर्यात के लिए दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता माना जाता है। अमेरिकी कार्रवाई के बाद ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC ने इसे सीधी आक्रामकता करार दिया और जवाबी कार्रवाई करते हुए जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागने का दावा किया।
जॉर्डन की एयर डिफेंस का बड़ा एक्शन
ईरान की तरफ से दागी गई मिसाइलों को लेकर जॉर्डन की सेना ने तुरंत मुस्तैदी दिखाई। जॉर्डन के सशस्त्र बलों ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की कि उनके देश के एयर-डिफेंस सिस्टम ने अपनी सीमा में घुसने वाली कुल आठ मिसाइलों को हवा में ही रोककर पूरी तरह तबाह कर दिया। इस त्वरित कार्रवाई की वजह से जॉर्डन के नागरिकों और किसी भी प्रकार की संपत्ति को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। हालांकि, आईआरजीसी की तरफ से यह दावा जरूर किया गया कि उन्होंने जॉर्डन के किंग हुसैन और अल-अजराक एयरबेस पर हमला किया है, जिससे वहां की तकनीकी बुनियादी ढांचे और फाइटर जेट्स की जगहों पर भारी नुकसान हुआ है। लेकिन जॉर्डन की तरफ से इन नुकसान के दावों की स्वतंत्र रूप से कोई पुष्टि नहीं की गई है।
भारतीय यात्रियों और उड़ानों पर क्या असर पड़ रहा है
इस पूरे सैन्य तनाव के बाद खाड़ी देशों के सभी एयरपोर्ट्स को पूरी तरह से बंद तो नहीं किया गया है, लेकिन विमानन सुरक्षा को लेकर चिंताएं काफी गहरी हो गई हैं। यूरोपीय यूनियन की विमानन सुरक्षा एजेंसी EASA का संघर्ष क्षेत्र सूचना बुलेटिन CZIB-2026-07R1 अभी भी सक्रिय है। इस बुलेटिन के तहत विमान कंपनियों को सलाह दी गई है कि वे बहरीन, कुवैत, कतर, यूएई और ओमान के मस्कट उड़ान सूचना क्षेत्र के पश्चिमी हिस्से से अपनी उड़ानों को बचाकर रखें। क्षेत्र की प्रमुख एयरलाइंस जैसे कि Emirates, Etihad, Qatar Airways, Gulf Air, Kuwait Airways, Oman Air, flydubai और Air Arabia अपनी आंतरिक सुरक्षा समीक्षा के आधार पर ही उड़ानों का संचालन कर रही हैं।
जो भारतीय यात्री यूएई, कतर, कुवैत, बहरीन या ओमान की यात्रा कर रहे हैं या वहां से भारत लौट रहे हैं, उन्हें सलाह दी जाती है कि वे एयरपोर्ट जाने से पहले अपनी फ्लाइट का स्टेटस एयरलाइन के पोर्टल पर जरूर चेक कर लें। उड़ानों के समय में अचानक बदलाव होने की पूरी संभावना बनी हुई है। जो यात्री कनेक्टिंग फ्लाइट से सफर कर रहे हैं, उनके लिए यह बहुत जरूरी है कि वे अपने बुकिंग स्टेटस पर लगातार नजर रखें, क्योंकि शुरुआती उड़ान ठीक रहने पर भी आगे का रूट बदला जा सकता है। किसी भी तरह की सीधी जानकारी और अलर्ट पाने के लिए यात्रियों को अपनी टिकट बुकिंग यानी पीएनआर में अपना चालू फोन नंबर और ईमेल आईडी अपडेट रखने की सलाह दी जाती है ताकि समय रहते सही जानकारी मिल सके।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का रणनीतिक महत्व
यह पूरा विवाद जिस इलाके यानी स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में हो रहा है, वह दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ज्यादा अहम है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 के शुरुआती छह महीनों के दौरान इस रास्ते से हर रोज औसतन 20.9 मिलियन बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरे हैं, जो पूरी दुनिया की कुल खपत का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा है। इसके अलावा हर दिन लगभग 11.4 बिलियन क्यूबिक फीट एलएनजी भी इसी रास्ते से निकलती है। चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े देश अपनी जरूरत का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा इसी रास्ते से मंगाते हैं। यही वजह है कि इस इलाके में थोड़ी सी भी गड़बड़ी होने पर वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की कीमतों, माल भाड़े और बीमा के खर्च पर बहुत बड़ा असर पड़ सकता है।