यमन के हूती विद्रोहियों का बड़ा ऐलान, अमेरिकी जहाजों को नहीं बनाएंगे निशाना

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को अब सात महीने पूरे हो चुके हैं, जिससे अमेरिकी सरकार को भारी रणनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। इस लंबे संघर्ष के कारण दुनिया भर में ऊर्जा संकट पैदा हो गया है और अमेरिकी सैन्य संसाधन भी काफी हद तक कम हो गए हैं। इस बीच ओमान में 13-14 सितंबर 2026 के सप्ताहांत पर अमेरिकी अधिकारियों और हूती नेताओं के बीच गुप्त बैठक हुई, जिसमें रेड सी में जहाजों की सुरक्षा को लेकर चर्चा की गई। इस पूरी स्थिति से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात को आम भाषा में समझें ताकि आपको पूरी जानकारी मिल सके।
ओमान बैठक में हूती विद्रोहियों का बड़ा फैसला
ओमान में हुई इस अहम चर्चा के दौरान हूती समूह ने अमरीकी जहाजों को निशाना न बनाने का वादा किया। उन्होंने साल 2025 के संघर्ष विराम समझौते पर टिके रहने की बात दोहराई। हालांकि उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि वे अमेरिकी जहाजों को तो नहीं छेड़ेंगे, और साथ ही इजरायल या अन्य कमर्शियल शिपिंग पर भी हमला न करने की बात कही, लेकिन इस समझौते से सऊदी अरब के जहाजों को पूरी तरह बाहर रखा गया है। यानी सऊदी जहाजों पर उनका खतरा अभी भी बना हुआ है। अमेरिकी विदेश विभाग ने इस बैठक की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन अधिकारियों ने यह जरूर माना है कि रेड सी में नेविगेशन को सुरक्षित रखना देश के लिए बहुत जरूरी है।
युद्ध का भारी आर्थिक और सैन्य नुकसान
ईरान के साथ चल रहे इस तनाव और युद्ध की वजह से अब तक लगभग 38.1 अरब डॉलर यानी भारी-भरकम राशि खर्च हो चुकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और उपराष्ट्रपति JD Vance के सामने अब एक बहुत बड़ा फैसला लेने की चुनौती है क्योंकि युद्ध को लेकर जनता में भी भारी गुस्सा देखा जा रहा है। हाल ही में आए आंकड़ों के मुताबिक करीब 71 प्रतिशत अमेरिकी मतदाताओं का मानना है कि सरकार के पास इस विवाद को सुलझाने का कोई ठोस प्लान नहीं है। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में तो यह भी सामने आया है कि इस युद्ध के दौरान अमेरिकी सेना द्वारा किए गए दो हमलों में युद्ध अपराध जैसी स्थिति बन सकती है।
क्षेत्रीय सुरक्षा और लाल सागर की स्थिति
जब से हूती विद्रोहियों ने यमन के रेड सी तट, मोचा बंदरगाह और बाब अल-मदब जलडमरूमध्य के पास के द्वीपों पर कब्जा किया है, तब से पूरे इलाके में तनाव कम नहीं हो रहा है। हूती नेता Hazem al-Assad भले ही जहाजों के सुरक्षित होने का दावा कर रहे हों, लेकिन सऊदी अरब से जुड़े जहाजों पर हमले लगातार जारी हैं। आईएमएफ पोर्टवाच के आंकड़ों के अनुसार, साल 2023 से 2025 के बीच हूती गतिविधियों की वजह से रेड सी में शिपिंग का काम 50 से 55 प्रतिशत तक कम हो गया है। इसी खतरे को देखते हुए अब इटली ने भी बाब अल-मदब इलाके में अपने युद्धपोत भेजने का ऐलान किया है, ताकि समुद्री रास्तों की सुरक्षा की जा सके।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच फारसी खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य से आने-जाने वाले जहाजों पर भी बुरा असर पड़ा है, जहां ईरानी बलों और ब्रिटिश नौसेना एजेंसियों ने जहाजों पर हमलों की सूचना दी है। दक्षिण कोरिया ने इस संघर्ष में अपनी सेना भेजने से साफ मना कर दिया है, जबकि चीन ने ईरान पर दबाव बनाया है कि वह हूती गतिविधियों को रोके। ईरानी राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian और विदेश मंत्री Abbas Araghchi इस अंतरराष्ट्रीय स्थिति को संभालने में लगे हुए हैं, जबकि अमेरिका और अन्य देश इस कठिन दौर से निकलने के रास्ते तलाश रहे हैं।