US का ईरान पर आर्थिक शिकंजा, चीन के तेल आयात पर लग सकते हैं कड़े प्रतिबंध.

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है और अब इस मामले में चीन की एंट्री से स्थिति और ज्यादा गंभीर हो गई है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी Mark Pfeifle ने 30 अगस्त 2026 को यह जानकारी दी कि अमेरिकी सरकार चीन के उन खरीदारों पर सीधे प्रतिबंध लगाने से बचना चाहती है जो ईरान से कच्चा तेल खरीदते हैं। उनका कहना था कि बीजिंग के खिलाफ ऐसे बड़े कदम उठाना कूटनीतिक रूप से काफी जटिल काम है। इसके साथ ही उन्होंने चीन को राष्ट्रपति Donald Trump की ईरान के खिलाफ अपनाई गई आर्थिक युद्ध की रणनीति के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बताया है।
विशेषज्ञों के मुताबिक चीन ने ईरान से अपने तेल आयात को प्रतिदिन करीब 1.5 मिलियन बैरल से घटाकर लगभग 500,000 बैरल कर दिया है। इसके बजाय चीन ने रूस, इराक और ब्राजील से तेल खरीदना शुरू कर दिया है। हालांकि इन सब बदलावों के बाद भी यह देखा जा रहा है कि चीन अंदरखाने ईरान की चुपचाप मदद कर रहा है। इसी बीच अमेरिकी खजाने के प्रमुख यानी ट्रेजरीSecretary Scott Bessent ने भी दबाव को और ज्यादा बढ़ा दिया है। उन्होंने 30 अगस्त 2026 को दुनिया भर के वित्तीय संस्थानों को कड़ी चेतावनी दी कि वे किसी भी ऐसे चीनी रिफाइनरी से अपने रिश्ते खत्म कर लें जो ईरान का तेल खरीदती है।
ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट का ऐलान और क्षेत्रीय तनाव
अमेरिकी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर कोई भी विदेशी बैंक इस व्यापार में मदद करता रहा तो उस पर कड़े प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इससे पहले Scott Bessent ने 24 अगस्त 2026 को 'Operation Economic Outcast' नाम से एक अभियान की घोषणा की थी। इस अभियान के तहत अमेरिका ने चीन, तुर्की और यूएई को चेतावनी दी थी कि अगर वे ईरान के साथ अपने आर्थिक संबंध बनाए रखते हैं तो उन्हें अमेरिका के वित्तीय गुस्से का सामना करना पड़ेगा। अधिकारियों ने यह भी बताया कि ईरान का मुख्य तेल निर्यात केंद्र जो Kharg Island पर स्थित है, वह अपनी पूरी क्षमता के करीब पहुंच चुका है। इस स्थिति की वजह से ईरान को रोजाना करीब 170 मिलियन डॉलर के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ सकता है।
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने पहले ही मिस्र के Banque Misr और हांगकांग की एक कंपनी पर प्रतिबंध लगा दिया है जो Bank Melli से जुड़ी हुई थी। हालांकि इसके बावजूद अमेरिका ने चीन और भारत जैसे बड़े व्यापारिक साझेदारों के खिलाफ अभी तक बहुत सख्त कदम नहीं उठाया है। इसके पीछे मुख्य वजह यह बताई जा रही है कि अमेरिका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले बुरे असर से डर रहा है। दूसरी तरफ चीन ने अपने घरेलू कंपनियों को साफ निर्देश दे दिया है कि वे अमेरिकी प्रतिबंधों की परवाह न करें। चीन ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक अधिकारों की रक्षा करने की पूरी कसम खाई है।
ईरान की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है भारी असर
इस बीच क्षेत्रीय तनाव में कोई कमी नहीं आई है और ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने यह बात खुद कबूल की है कि नौसेना की नाकेबंदी और प्रतिबंधों की वजह से उनके देश के व्यापार में 35% की भारी गिरावट आई है। इसके अलावा ईरान के उप विदेश मंत्री Kazem Gharibabadi ने बताया कि Strait of Hormuz यानी हॉर्मूज जलडमरूमध्य अभी भी पूरी तरह से बंद है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स का कहना है कि इस जलमार्ग पर उनका पूरा और सख्त नियंत्रण बना हुआ है। उन्होंने इस रास्ते को लेकर अमेरिका के सभी दावों को खारिज कर दिया और कहा कि अमेरिका केवल ऊर्जा की कीमतों में हेरफेर करने की कोशिश कर रहा है।