पश्चिम एशिया संघर्ष का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर

पश्चिम एशिया में जारी तनाव का दुनिया भर की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर बहुत गहरा असर पड़ रहा है। यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया के प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री अमर्त्य लाहिरी ने हाल ही में इस बात की चेतावनी दी है कि इस संघर्ष के परिणाम काफी बड़े और दूरगामी हो सकते हैं। कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव के दौरान उन्होंने वैश्विक आर्थिक चुनौतियों पर अपने विचार साझा किए।
कच्चे तेल की कीमतें और महंगाई
अर्थशास्त्री अमर्त्य लाहिरी के अनुसार, पश्चिम एशिया संकट का सबसे बड़ा और सीधा प्रभाव कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ता है। जब ऊर्जा के दाम बढ़ते हैं, तो इससे महंगाई में भी तेजी आती है। उन्होंने बताया कि:
- तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से अर्थव्यवस्था के कई अहम क्षेत्र सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं।
- बढ़ती हुई महंगाई सीधे तौर पर देशों की मौद्रिक नीतियों और चुनावी राजनीति को भी प्रभावित कर सकती है।
- इस संकट का असर केवल क्षेत्रीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिका समेत पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था इसकी चपेट में आ रही है।
रूस से तेल आयात और अमेरिका का दबाव
रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका के दबाव के मुद्दे पर बात करते हुए लाहिरी ने कहा कि हर देश को सबसे पहले अपने आर्थिक हितों की रक्षा करनी होती है। भारत जैसी उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए जहां आर्थिक जरूरतें सबसे ऊपर हैं, वहां सस्ते और सुलभ स्रोતો से ऊर्जा की खरीद जरूरी हो जाती है। उन्होंने भारतीय कूटनीति की सराहना करते हुए कहा कि सरकार ने इस दबाव को बेहद समझदारी से संभाला है और अत्यधिक टैरिफ की धमकियों की भी एक व्यावहारिक सीमा होती है।
डॉलरीकरण और भविष्य की मुद्राएं
वैश्विक स्तर पर डी-डॉलरीकरण (डॉलर पर निर्भरता कम करने) की चल रही बहस पर लाहिरी का मानना था कि यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं है। अमेरिकी डॉलर आज भी वैश्विक वित्तीय प्रणाली में गहराई से समाया हुआ है। वर्तमान में ऐसी कोई अन्य मुद्रा मौजूद नहीं है जो डॉलर की तरह स्थिरता, इतिहास और वैश्विक स्वीकार्यता का विकल्प बन सके। हालांकि, डिजिटल वित्तीय क्षेत्र में हो रहे नए बदलाव भविष्य में अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक प्रणाली को नया आकार जरूर दे सकते हैं।
फिलहाल, पश्चिम एशिया की राजनीतिक अनिश्चितता का हल कब निकलेगा, यह भविष्यवाणी करना बेहद कठिन है क्योंकि यह पूरी तरह से एक जटिल राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है।