West Bank में इसराइली सेना ने तोड़े 12 घर, 70 लोग हुए बेघर और बच्चों को भी होना पड़ा परेशान.

इसराइली सैन्य बलों ने ऑक्यूपाइड वेस्ट बैंक के खिरबत अल-तब्बान गांव में दो दिनों के भीतर बड़ी कार्रवाई करते हुए कुल 12 घरों को जमींदोज कर दिया है। यह पूरी घटना 2 और 3 सितंबर 2026 के बीच की है, जिसके कारण कुल 70 स्थानीय निवासी पूरी तरह बेघर हो गए हैं। इस बड़ी कार्रवाई की चपेट में आने वाले लोगों में 28 छोटे बच्चे भी शामिल हैं, जिन्हें इस तबाही के बाद खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर होना पड़ा है। घरों के टूटने के तुरंत बाद, मानवीय सहायता प्रदान करने वाले संगठन मौके पर पहुंचे और प्रभावित परिवारों के बीच तंबू तथा कंबल जैसे जरूरी सामान बांटे। रिपोर्ट के मुताबिक, इस मुश्किल हालात में पुरुषों को अपनी भेड़ों के साथ रात गुफाओं में बितानी पड़ी, जबकि महिलाओं और बच्चों ने राहत शिविरों में मिले तंबुओं का सहारा लिया।
इसराइली प्रशासन की दलील और कानूनी पहलू
इस पूरी तोड़फोड़ की कार्रवाई को लेकर इसराइली अधिकारियों और COGAT (कॉर्डिनेटर ऑफ गवर्नमेंट एक्टिविटीज इन द टेरिटरीज) ने अपनी सफाई पेश की है। उनका कहना है कि जिन घरों को गिराया गया है, वे सभी इमारतें बिना किसी आधिकारिक अनुमति के बनाई गई थीं। ये सभी घर 'फायरिंग जोन 918' के दायरे में आते हैं, जिसे सेना ने अपने मिलिट्री ट्रेनिंग यानी सैन्य अभ्यास के लिए आरक्षित किया हुआ है। इस मामले में साल 2022 की एक हाई कोर्ट ऑफ इस्राइल की पुरानी अदालत के फैसले का हवाला भी दिया गया है, जिसमें कहा गया था कि इस क्षेत्र में रहने वाले फिलिस्तीनी नागरिकों के पास स्थायी रूप से रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। दूसरी तरफ, मानवाधिकार संगठन B'Tselem ने इस दावे पर सवाल उठाते हुए कहा है कि वेस्ट बैंक के एरिया सी में फिलिस्तीनी लोगों के लिए बिल्डिंग अप्रूवल या मकान बनाने का परमिट हासिल करना लगभग नामुमकिन बना दिया गया है।
मानवाधिकार संगठनों की चिंता और विरोध प्रदर्शन
मानवाधिकार संगठन B'Tselem के निदेशक यूलि नोवाक ने इस पूरी घटना की कड़ी निंदा करते हुए इसे एक सोची-समझी नीति का हिस्सा बताया है। उनका यह भी कहना है कि अक्टूबर 2023 के बाद से अकेले खिरबत अल-तब्बान इस इलाके का ऐसा 66वां फिलिस्तीनी समुदाय बन गया है, जिसे जबरन उजाड़ा गया है। संयुक्त राष्ट्र सहित कई अन्य अंतरराष्ट्रीय मानवीय सहायता संगठनों ने भी इस घटना पर गहरी चिंता जताई है। इन संगठनों ने याद दिलाया है कि युद्धग्रस्त या अधिकृत क्षेत्रों में रहने वाले आम नागरिकों को अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत पूरी सुरक्षा पाने का अधिकार है। इसके बावजूद, गांव के लोगों ने साफ कर दिया है कि वे अपनी पुश्तैनी जमीन को छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे और हर हाल में यहीं टिके रहेंगे.
पारंपरिक जीवनशैली और स्थानीय लोगों का संघर्ष
खिरबत अल-तब्बान गांव मसाफेर यट्टा समुदाय के क्लस्टर का एक अहम हिस्सा माना जाता है। यहां के लोग लंबे समय से गुफाओं में रहने, खेती करने और भेड़-बकरी चराने के पारंपरिक पेशे से जुड़े हुए हैं। स्थानीय निवासियों का यह मानना है कि उनका इस जमीन पर डटे रहना ही उनके ऊपर हो रहे जबरन विस्थापन और बस्तियों के फैलाव के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई है। गांव के लोग अपने उजड़े हुए घरों को दोबारा बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं ताकि वे अपनी संस्कृति और अपनी पुरानी जीवनशैली को बचाकर रख सकें। इस तरह की घटनाएं आम आदमी के जीवन पर सीधा असर डालती हैं, जहां लोग केवल अपने बुनियादी अधिकारों और जीने की जगह के लिए संघर्ष कर रहे हैं।