यूके और कनाडा में नौकरी खोजने वाले भारतीय रहें सावधान, ऑफर लेटर और वर्क परमिट के बीच का अंतर न समझकर हो रहा नुकसान

नई दिल्ली: ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप में नौकरी तलाश रहे कई भारतीय प्रोफेशनल्स ऑफर लेटर और वर्क परमिट के बीच के अंतर को न समझ पाने के कारण आर्थिक नुकसान झेल रहे हैं।
किनब्रिज इमिग्रेशन के संस्थापक कल्याण बिरिंग ने बताया कि आवेदकों में महत्वाकांक्षा की कमी नहीं है, बल्कि समस्या इमिग्रेशन प्रक्रिया की जटिलताओं के बारे में स्पष्ट जानकारी न होने की है।
इंडस्ट्री की जानकारियों के मुताबिक, जॉब ऑफर मिलना आसान है लेकिन वर्क परमिट पाना काफी मुश्किल होता है क्योंकि इसके लिए एम्प्लॉयर स्पॉन्सरशिप की जरूरत होती है। ब्रिटेन में इसके लिए सर्टिफिकेट ऑफ स्पॉन्सरशिप (CoS) और कनाडा में लेबर मार्केट इम्पैक्ट असेसमेंट (LMIA) की आवश्यकता होती है।
विदेशी कर्मचारियों को स्पॉन्सर करने वाले नियोक्ताओं को यह साबित करना पड़ता है कि उन्हें कोई उपयुक्त स्थानीय उम्मीदवार नहीं मिला। इस प्रक्रिया में लंबा विज्ञापन समय लगता है और कई लाख रुपये का कानूनी खर्च उठाना पड़ता है। साथ ही कंपनी की वित्तीय स्थिरता और उसके कार्यकाल के कड़े मापदंडों को पूरा करना होता है।
इन्हीं प्रशासनिक बोझों और जोखिमों की वजह से विदेशी कंपनियां अक्सर उन उम्मीदवारों को प्राथमिकता देती हैं जिनके पास पहले से ही ओपन वर्क परमिट होता है।
इमिग्रेशन के बदलते वैश्विक नियमों ने अंतरराष्ट्रीय कामगारों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। अमेरिका में होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने 14 अक्टूबर 2026 से एम्प्लॉयमेंट ऑथोराइजेशन डॉक्यूमेंट्स (EADs) के लिए ऑटोमैटिक एक्सटेंशन को खत्म करने का नियम फाइनल कर दिया है।
इस बदलाव से वह 540 दिनों का सेफ्टी नेट खत्म हो गया है, जिसकी मदद से विदेशी नागरिक परमिट रिन्यूअल के इंतजार के दौरान काम कर सकते थे। 30 जून 2026 तक रिन्यूअल के लिए 4.32 लाख से ज्यादा आवेदन लंबित थे। अमेरिका में मौजूद कई भारतीय प्रोफेशनल्स को अब नौकरी में गैप का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि वे अपने वर्तमान परमिट खत्म होने से 180 दिन पहले तक रिन्यूअल के लिए आवेदन नहीं कर सकते।